मसान (Masaan)

तसव्वुर से उसके ही 

कुछ, यूँ उतर के तुम 

उसके नज़रों से छल करती ,


आज छज्जे पे बैठ के उसके 

दिल का, अकस्मात् 

टोह क्यों ले रही


याद है वो मेले में 

इनायत थी मिली उसे 

जो गुब्बारों की सनसनी दौड़ में 

आतिशबाजियों के बीच 

मन विक्षिप्त कर दिया था तुमने


जब संगम के किनारे 

उस शांत

मदमस्त हवा के बीच 

सलीके में 

लब काँप उठे थे उसके


प्रेम की चरमसीमा थी वो 

या अमरसंगीत का शुभारम्भ 

जब घाट पर उस दिन 

तुम्हारा मोती चुरा कर उसने 

अपनी रूह के संग

जलाया था तुम्हे


उन्हीं लबों से उसने 

सुरा उतारी थी भीतर 

वो दोस्त ही तो थे 

जो प्रेम के छाये में भी 

सूरज को मुट्ठी में लिए फिरते थे


आओ उड़ चलें फिर 

इस मसान से कहीं दूर 

लौट आएंगे जब 

तुम थक जाओगी 

अकेले गोते लगाते लगाते


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