धुआं (Dhuaan)

ग़र्द उड़ाते उन पहियों को

हर सांझ हथेली मार - मार

सड़कें जो नापी सब ने ;

उस धुएं में छुपे

सत्य की परवाह थी क्या किसे ?

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ढलते उसी वक्त में

चूल्हे में गोयठे सुलगाती

हज़ारों बार आँखें सेंकी ;

उन अगणित माताओं के

नयनों की परवाह थी क्या किसे ?

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उन्मुक्त मित्र-मंडलियों संग

जब धुएं में विलुप्त अंतर्मन

फिरदौस की सैर हम करते ;

तब दिल में उस बुझते

प्रेम की परवाह थी क्या किसे ?

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मसान के मंदभाग्य भूमि पे

पिता से अंतिम सीख लेते

जब धुएं-स्वरुप अलोप रहा बचपन;

तब घर में छूटे आखिरी

निवाले की परवाह थी क्या किसे ?

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